Friday, 23 December 2011

आख़िर क्यूँ ?


मन में हलचल थी मची , सन्नाटा था बाहर छाया
क्यूँ हम निकल रहे थे घर से , क्यूँ खामोश था हमारा साया ?

हमने कोई गुस्ताखी तो की नहीं , ही किसी को ठोकके गिराया
क्यूँ हम थे सब भुगत रहे , किस गुनाह को था हमने अंजाम लगाया ?

दिन में जुर्रत हुई , रात के अंधेरों में यह कदम उठाया
क्यूँ घर को , उससे जुड़े जज़बातों को पीछे छोड आगे कदम बढ़ाया ?

लहरों की तरह चलते रहे बस, साहिल कहाँ है कुछ समझ आया
क्यूँ ऐसा गज़ब हुआ हमारे साथ , क्यूँ बीच मजधार में ख़ुद को अकेला पाया ?

लहरें कुछ थम सी गई कहीं , ख़ुद को इक टूटी-फूटी छत्त के तले पाया
क्यूँ घर होते हुए भी ख़ुद को रास्ते पे गिरा हुआ पाया ?

हँसते थे वोह चेहरे कभी लहलहाते खेतों और दरख्तों के बीच
क्यूँ फ़ीकी पड गई वोह हसीं , क्यूँ उन हँसते चेहरों पे है आज बेबसी और लाचारी का साया ?

ख़ुद किसान होकर आज तक सबका पेट था भरवाया
क्यूँ भूखे पेट हैं आज वोह सब , क्यूँ हँसता है उनपे उनका ही साया ?

इज्ज़त से रहते थे , इज्ज़त की ही थी भूख उन्हें
क्यूँ दो जोड़ी कपड़ों के सिवा कुछ भी उनके हाथ आया ?

हर सवाल पे चुप रहा तू , ऐसी अजब है तेरी माया
जवाब तू भी क्या देता ख़ैर , जब डर के मारे तू भी कपकपाया ||


P.S. This post is regarding kashmiri pandits in exile.

2 comments:

  1. Ye lo mere vichaar bhi padh lo


    ना जाने क्यों हम

    घने काले बादलों के पीछे

    देख नहीं पाते छुपे इंद्रधनुष को

    ना जाने क्यों

    शहर के शोर के बीच

    सुन नहीं पाते पक्षियों का कलरव

    ना जाने क्यो

    संसार के दुख सुख में

    मह्सूस नहीं कर पाते अपना अस्तित्व

    और ना जाने क्यो

    कुछ संजीदा करने के भ्रम में

    खेल नहीं पाते खेल बच्चों का

    ना जाने क्यों हम

    मानते है म्रत्यु को एक सुदूर सम्भावना

    और जीवन को बंधन नियती का

    जबकि म्रत्यु को पाना तो हमारी नियति है

    और जीवन भरा हुआ है अनेक सम्भावनाओं से….



    Ye lo mere vichaar bhi padh lo

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