हवा ने जब अपना रुख बदला |
ऐसा लगा प्यार का पैगाम आया ||
चेहरा पहचानना चाहा तो |
धुन्द्लाता हुआ इन्सान नज़र आया ||
ट्रिंग ट्रिंग सुन के फ़ोन उठाया |
दिमाग पर असलियत का खुमार छाया ||
ऐसा लगा कितने हसीन थे यह दो पल |
जहाँ हमने उन्हें और आप को अकेले पाया ||
मुह से हेल्लो निकलते ही समझ आया |
की फिर से वोडाफ़ोन ने दिमाग का दही जमाया ||
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