Wednesday, 9 May 2012

फ़क्र



पाप, दोष, घृणा, अहिंसायह सबदेख सकता है हर कोई
देखो तो कुछ ऐसा देखो कि आँखों को तुमपे नाज़ हो

गीतों के अल्फाज़ों को लेकेगुनगुना सकता है हर कोई
गाओ तो कुछ ऐसा गाओ कि गीतों को तुमपे नाज़ हो

घुँघरू बांधके पैरों मेंथिरक सकता है हर कोई
नाचो तो कुछ ऐसा नाचो कि घुंघरुओं को तुमपे नाज़ हो

मिज़ाज रहता है रंगीन हरदमदावा कर सकता है हर कोई
रंगीन बनो तो कुछ ऐसे बनो कि रंगों को तुमपे नाज़ हो

प्यार में पड़नावादे करनाकर सकता है हर कोई
चाहो तो कुछ ऐसे चाहो कि मोहब्बत को तुमपे नाज़ हो

बोलने को तो बहुत कुछ बोल सकता है हर कोई
कहो तो कुछ ऐसा कहो कि लफ़्ज़ों को तुमपे नाज़ हो

कागज़ की परतों को लेकेभर सकता है लफ़्ज़ों से हर कोई 
लिखो तो कुछ ऐसा लिखो  कि  कलम को तुमपे नाज़ हो  

No comments:

Post a Comment