गमों की बारिश थी, ज़िन्दगी के सफ़र में
रोना जब चाहा तो आंसुओं की कमी हो गई
तनहा थी रातें भी, नैनों के आँगन में
सोना जब चाहा तो नींद की कमी हो गई
सोना जब चाहा तो नींद की कमी हो गई
झुरियों के नक़्शे थे, चेहरे की दीवारों पे
मुस्कुराना जब चाहा तो खुशियों की कमी हो गई
मुस्कुराना जब चाहा तो खुशियों की कमी हो गई
कहना था बहुत कुछ, मुरझाये इन होंठों से
बोलना जब चाहा तो लफ़्ज़ों की कमी हो गई
बोलना जब चाहा तो लफ़्ज़ों की कमी हो गई
चंद लम्हे ज़िन्दगी से अपने, बाँटने थे किसी अपने से
बुलाना जब चाहा तो अपनों की कमी हो गई
बुलाना जब चाहा तो अपनों की कमी हो गई
ज़िन्दगी प्यार का गीत है, सुना था यह भी कहीं
गुनगुनाना जब चाहा तो गीतों की कमी हो गई
गुनगुनाना जब चाहा तो गीतों की कमी हो गई
कुछ भी नहीं ज़िन्दगी, गर मोहब्बत न हो उसमें
दिल लगाना जब चाहा तो दिलदार की कमी हो गई
दिल लगाना जब चाहा तो दिलदार की कमी हो गई
क्यूँ बनाई यह दुनिया, क्या मख्सद था उसका
सवाल जब करना चाहा तो भगवान् की कमी हो गई
सवाल जब करना चाहा तो भगवान् की कमी हो गई
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