महफूज़ हूँ यहाँ इस अनजाने शहर में
हक़ीकत से दूर इस हसीन गुलिस्तान में
धुआं ही धुआं है भरा, चारों ओर देखा जो मैंने
कोई आग नहीं है पर, इस अनोखी सी दुनिया में
कोई आग नहीं है पर, इस अनोखी सी दुनिया में
कोई पराया लगता है अपना, अपना भी कभी पराया सा
लगाव किसी से नहीं है, इस माया से मुक्त संसार में
न मैं हूँ किसी की, न ही कोई है मेरा
रिश्तों की डोर नहीं है, इस जन्नत-ए-बहार में
रिश्तों की डोर नहीं है, इस जन्नत-ए-बहार में
न कोई शोर न कोई गम, न कोई अपना न कोई सितम
सुकून भरी है ज़िन्दगी, ख़्वाबों से भरे इस जहाँ में
सुकून भरी है ज़िन्दगी, ख़्वाबों से भरे इस जहाँ में
महफूज़ हूँ यहाँ इस अनजाने शहर में
हक़ीकत से दूर इस हसीन गुलिस्तान में
हक़ीकत से दूर इस हसीन गुलिस्तान में
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