Thursday, 26 January 2012

बुढ़ापा


चेह्चहाना दस्तूर था कल तक
इक धुन सी सवार थी
कब कैसे लफ्ज़ हुए ख़तम
आज ख़ामोशी भी ख़ामोश सी है ||

हर दुश्मन को दी थी मात
हराने की आदत सी लगी थी
तब तो यह खून था गरम
आज हर दाव एक मजबूरी सी है ||

कुदरत के करिशमे देखे कईं
फिज़ाएं रंगीन हुआ करती थी
खुदा का ही था रहमो करम
आज हवाएं भी मगरूर सी हैं ||

दास्तानें हमने भी बनायीं कईं
चाँद से गुफ्तगू किया करते थे
आँखें अब हो गयीं हैं नम
आज फ़लक और ज़मीं के बीच दूरी सी है ||

कईं हदें भी पार की  हमने
क़दमों में पर से लगे थे
गिनके रखते हैं अब हर कदम
आज ज़मीं की सीरत कुछ बदली सी है ||

यह सफ़र बड़ा हसीं रहा
कुछ रंगीन ख्वाब पूरे किये
क्यूँ करते रहे उनपे ज़ुल्म
आज मिज़ाज में इक खराश सी है ||

क्यूँ यह सब हैं फुसफुसा रहे
कुछ पल ही बाकी हैं जो अब
सुनने वाले भी रहे अब कम
पर ज़िन्दगी गुजारना ज़रूरी भी है || 

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