Wednesday, 25 January 2012

लड़की


जनम लिया सबके ही चेहरे उतर गए
लड़की क्यूँ आई अपने घर में !
लड़के की कामना में वोह भूल गए
लड़की ही सही, इंसान ही हूँ मैं ||

पाल - पोस के बड़ा तो किया
पर हमेशा ही रखा गया एक फर्क |
बेटे के लाड में वोह भूल गए
बेटी ही सही, इंसान ही हूँ मैं ||

बूढ़े से शादी करवाई गयी
दहेज की क्यूंकि थी कोई भी शर्त |
लालच की आड में वोह भूल गए
बोझ नहीं, इंसान ही हूँ मैं ||

ससुराल में भी मिला सुख
सुलूक हुआ बद्जातों सा |
खेलके मेरे जज्बातों से वोह भूल गए
खिलौना नहीं, इंसान ही हूँ मैं ||

जाने से उनके बढ़ गया यह तूफ़ान
तानों पे ताने मारे गए |
घर से निकालते हुए वोह भूल गए
बेवा ही सही, इंसान ही हूँ मैं ||

उम्मीद तुझसे ही थी कुछ
पर तू भी सब कुछ देखता गया |
दुःख है कि तू भी भूल गया
भगवान नहीं, इंसान ही हूँ मैं
||

No comments:

Post a Comment