Thursday, 26 January 2012

एक तरफ़ा प्यार


मिलने को हमसे बेक़रार रहते
दिल की दीवारों पे हमारा नाम होता
ख्वाबों में हमें ही देखा करते
आँखों में चेहरा हमारा बसा होता
खुद से ही बतियाते रहते
हर बात में हमारा नाम होता
कोशिश छुपाने की कितनी भी करते
मोहब्बत ही चर्चे-आम होता
लाखों की भीड़ में चलते चलते
ढूँढना हमें, बस यही इक काम होता
घडी की सूइयों को तकते रहते
जैसे हमारा ही इंतज़ार होता
पास हमारे नहीं रहते
तो यादों का बाज़ार होता
दो अनजान दिलों के बीच
मोहब्बत का व्यापार होता
यह सब तुम भी समझ पाते
गर तुमको भी हमसे प्यार होता ||

बुढ़ापा


चेह्चहाना दस्तूर था कल तक
इक धुन सी सवार थी
कब कैसे लफ्ज़ हुए ख़तम
आज ख़ामोशी भी ख़ामोश सी है ||

हर दुश्मन को दी थी मात
हराने की आदत सी लगी थी
तब तो यह खून था गरम
आज हर दाव एक मजबूरी सी है ||

कुदरत के करिशमे देखे कईं
फिज़ाएं रंगीन हुआ करती थी
खुदा का ही था रहमो करम
आज हवाएं भी मगरूर सी हैं ||

दास्तानें हमने भी बनायीं कईं
चाँद से गुफ्तगू किया करते थे
आँखें अब हो गयीं हैं नम
आज फ़लक और ज़मीं के बीच दूरी सी है ||

कईं हदें भी पार की  हमने
क़दमों में पर से लगे थे
गिनके रखते हैं अब हर कदम
आज ज़मीं की सीरत कुछ बदली सी है ||

यह सफ़र बड़ा हसीं रहा
कुछ रंगीन ख्वाब पूरे किये
क्यूँ करते रहे उनपे ज़ुल्म
आज मिज़ाज में इक खराश सी है ||

क्यूँ यह सब हैं फुसफुसा रहे
कुछ पल ही बाकी हैं जो अब
सुनने वाले भी रहे अब कम
पर ज़िन्दगी गुजारना ज़रूरी भी है || 

शाही रथ


आँखों के सामने आई जो
हालत उसकी बेचारी सी थी
आते ही उससे लिपट गए
जैसे कोई कन्या कुंवारी थी
स्वयंवर जैसा दृश्य था
सबने ही झपटी मारी थी
सफ़ल हुए जितने भी लोग
चेहरे पे उनके मुस्कान जारी थी
शर्तें उसकी भी थी बहुत
पूरी वोह करना एक ज़िम्मेदारी थी
सफ़ल हुए लोगों में भी
कुछ की किस्मत तो भारी थी
बैठे तो थे वोह किसी तरह
सांसें शुक्र है की जारी थी
जुदा हुए उससे फिर जब
छाई इक अजब ख़ुमारी थी
दिमाग चलना भी हुआ था बंद
जैसे लगी कोई बिमारी थी
सर भी था कुछ भारी सा
पैरों में इक लाचारी थी
काम में जी लग रहा था अब
इतनी बढ़िया टम-टम की सवारी थी

P.S.
टम-टम
is supposedly a 6 seater ideally but practically it accomodates as many as possible depending on the situation.

Wednesday, 25 January 2012

लड़की


जनम लिया सबके ही चेहरे उतर गए
लड़की क्यूँ आई अपने घर में !
लड़के की कामना में वोह भूल गए
लड़की ही सही, इंसान ही हूँ मैं ||

पाल - पोस के बड़ा तो किया
पर हमेशा ही रखा गया एक फर्क |
बेटे के लाड में वोह भूल गए
बेटी ही सही, इंसान ही हूँ मैं ||

बूढ़े से शादी करवाई गयी
दहेज की क्यूंकि थी कोई भी शर्त |
लालच की आड में वोह भूल गए
बोझ नहीं, इंसान ही हूँ मैं ||

ससुराल में भी मिला सुख
सुलूक हुआ बद्जातों सा |
खेलके मेरे जज्बातों से वोह भूल गए
खिलौना नहीं, इंसान ही हूँ मैं ||

जाने से उनके बढ़ गया यह तूफ़ान
तानों पे ताने मारे गए |
घर से निकालते हुए वोह भूल गए
बेवा ही सही, इंसान ही हूँ मैं ||

उम्मीद तुझसे ही थी कुछ
पर तू भी सब कुछ देखता गया |
दुःख है कि तू भी भूल गया
भगवान नहीं, इंसान ही हूँ मैं
||

Friday, 20 January 2012

हफ्ता


चेहरा था मुरझाया सा, मन में था एक ही सवाल
कैसे यह दो दिन ख़तम हुए, लम्बे होते काश, जैसे एक साल
दिमाग तो शुरू करना था, क्यूंकि वोह दिन था सोमवार ||
एक दिन तो अब था निकल गया, पर बाकी थे अब अगले चार
एक दिन को क्यूँ बर्बाद किया, अब लग गए कामों के अम्बार
काम तो शुरू करना था, क्यूंकि वोह दिन था मंगलवार ||
दिन गिनने की आदत सी लगी, दो दिन ही हैं अब आज के बाद
वीकेंड वर्किंग था पिछली बार, जायेंगे कहाँ अब की बार
सोचना तो शुरू करना था, क्यूंकि वोह दिन था बुद्धवार ||
ख़ुशी चेहरे से थी झलक रही, क्या चढ़ा था इश्क का बुख़ार ?
ग़लत समझे थे लोग , दरअसल, निखर रहा था छुट्टी से प्यार
यह प्यार तो शुरू करना था, क्यूंकि वोह दिन था ब्रहस्पतिवार ||
मोहब्बतें हमने हैं देखी कईं, खुद इश्क में रहे हमेशा ही गवार
आज मौसम है कुछ बदला सा, आई है चारों तरफ़ बहार
बरसात का होना लाज़मी था, क्यूंकि वोह दिन था शुक्रवार ||
आखिर वोह दिन अब ही गया, जिसके लिए थे इतने बेक़रार
एक दिन में जी ली हर ख़ुशी, इस दिन की है यह ख़ास बात
जीना तो शुरू करना था, क्यूंकि वोह दिन था शनिवार ||
अजब सा है यह दिन भी, कबसे था इसका इंतज़ार
दिन गिन गिन हफ्ता बीत गया, कल फिरसे अब होगा दीदार
चिंता तो शुरू होनी थी, क्यूंकि वोह दिन था रविवार ||