Saturday, 31 December 2011

Happy New Year !!!


माना कि जनम मरन सब उसके ही हाथ में है
ख्वाहिशें पूरी करने में उसकी मसरूफ रहते हैं सब
पर आज से यह ध्यान रखना
ख्वाहिशें अपनी भी पूरी करना
क्यूँ रखा है उनको संभाल
मुबारक हो आने वाला नया साल ||

माना कि काम के बोझ तले रहते हैं सब
घरवालों की अहमियत घटने लगी है अब
पर आज से यह ध्यान रखना
दोनों में एक संतुलन बनाये रखना
उनका भी थोड़ा कर लेना ख़याल
मुबारक हो आने वाला नया साल ||

माना कि ज़िन्दगी के दो अहम पहलू हैं गम और ख़ुशी
तक़दीर के फैसले पे होता है इनकी तादाद का फर्क
पर आज से यह ध्यान रखना
ख़ुशी को सीने से लगाये रखना
और गम को देना जड़ से निकाल
मुबारक हो आने वाला नया साल ||

माना कि ज़हन में रहता है सबके एक सवाल
आखिर जियूँगा मैं कितने साल ?
पर आज से यह ध्यान रखना
भूलके इस सवाल को , हर लम्हा जीने कि कोशिश करना
क्यूंकि उम्र का पड़ रहा है अकाल
मुबारक हो आने वाला नया साल ||

Thursday, 29 December 2011

I, me and Myself


ये गुलशन है घर मेरा , हर चमन से वाकिफ़ हूँ मैं
इस डाल से उस डाल तक फुदकती चली हूँ मैं ||

आँधी - तूफान जब भी आये , डालियों के साये में छुपी हूँ मैं
थम जाने पर उनके थिरकते हुए गाती चली हूँ मैं ||

फूलों के खिलने पे बरसात में , हर रंग के फूल पे खेली हूँ मैं
मुरझा जाने पर उनके कुछ रूठ सी गयी हूँ मैं ||

ढूँढना चाहा जब भी मुझे , इसी गुलिस्तान में मिली हूँ मैं
पहचान मेरी अब जान लो , इस गुलशन की बुलबुल हूँ मैं ||
 

Friday, 23 December 2011

आख़िर क्यूँ ?


मन में हलचल थी मची , सन्नाटा था बाहर छाया
क्यूँ हम निकल रहे थे घर से , क्यूँ खामोश था हमारा साया ?

हमने कोई गुस्ताखी तो की नहीं , ही किसी को ठोकके गिराया
क्यूँ हम थे सब भुगत रहे , किस गुनाह को था हमने अंजाम लगाया ?

दिन में जुर्रत हुई , रात के अंधेरों में यह कदम उठाया
क्यूँ घर को , उससे जुड़े जज़बातों को पीछे छोड आगे कदम बढ़ाया ?

लहरों की तरह चलते रहे बस, साहिल कहाँ है कुछ समझ आया
क्यूँ ऐसा गज़ब हुआ हमारे साथ , क्यूँ बीच मजधार में ख़ुद को अकेला पाया ?

लहरें कुछ थम सी गई कहीं , ख़ुद को इक टूटी-फूटी छत्त के तले पाया
क्यूँ घर होते हुए भी ख़ुद को रास्ते पे गिरा हुआ पाया ?

हँसते थे वोह चेहरे कभी लहलहाते खेतों और दरख्तों के बीच
क्यूँ फ़ीकी पड गई वोह हसीं , क्यूँ उन हँसते चेहरों पे है आज बेबसी और लाचारी का साया ?

ख़ुद किसान होकर आज तक सबका पेट था भरवाया
क्यूँ भूखे पेट हैं आज वोह सब , क्यूँ हँसता है उनपे उनका ही साया ?

इज्ज़त से रहते थे , इज्ज़त की ही थी भूख उन्हें
क्यूँ दो जोड़ी कपड़ों के सिवा कुछ भी उनके हाथ आया ?

हर सवाल पे चुप रहा तू , ऐसी अजब है तेरी माया
जवाब तू भी क्या देता ख़ैर , जब डर के मारे तू भी कपकपाया ||


P.S. This post is regarding kashmiri pandits in exile.

Monday, 19 December 2011

ख़त


ख़्वाबों में तेरे डूबे थे , दिल में अजब झंकार हुई
मिलने की ख्वाहिश जगी फिरसे , जब भी तुझे याद किया ||

यादों को कैद करना भी चाहा , इक कोरा कागज़ और सियाही लेके
तेरे हुस्न पे लिखने की ख्वाहिश जगी फिरसे, जब भी तुझे याद किया ||

तेरी जुल्फों की वोह महक , हावी हुई कुछ ऐसे
उनमें खोने की ख्वाहिश जगी फिरसे , जब भी तुझे याद किया ||

कड़कती धूप के इशारों पे , पलकें तेरी झुकी कुछ ऐसे
साया बनने की ख्वाहिश जगी फिरसे , जब भी तुझे याद किया ||

हाथ में हाथ डाले हुए , कंगन घूमता रहता कलाई पे तेरी
हमकदम बनने की ख्वाहिश जगी फिरसे , जब भी तुझे याद किया ||

तारीफ सुनते ही , लाल होते तेरे गाल उसी पल
उन्हें छूने की ख्वाहिश जगी फिरसे , जब भी तुझे याद किया ||

कागज़ तो कोरा ही रह गया , सियाही भी सूख गयी है अब
ख़त लिखने की ख्वाहिश अधूरी रही ऐसे , जब भी तुझे याद किया ||