ठंड में धूप की किरणों के जैसी
सूखे रेगिस्तान में पानी के जैसी
सर्दी में गरम चाय के जैसी
तपती धूप में सर्द हवाओं के जैसी
फूल की पंखुड़ियों पे ओस की बूंदों के जैसी
मंदिर में चल रहे कीर्तन के जैसी
पूजा में मिलने वाले प्रसाद के जैसी
एक नाचीज़ को मिलने वाले पुरस्कार के जैसी
दहकते शोलों पे बारिश के जैसी
आसमान में टिमटिमाते सितारों के जैसी
समंदर में चलती लहरों के जैसी
पिघलके गिरते हुए मोम के जैसी
दीये में जलने वाले तेल के जैसी
भरी बरसात में छाते के जैसी
फिज़ाओं के महकने के जैसी
गीतों से जुडे सुरों के जैसी
ज़ख्मों पे लगने वाले मलहम के जैसी
अल्फाज़ो से बनी हर डोर के जैसी
हर गम को भूलने वाली दवा के जैसी
ऐसी अनगिनत उपमाओं के जैसी
है बस माँ की एक झप्पी
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