Sunday, 16 December 2012

रूपा की ज़ुबानी


कहते हैं लोग मुझे, उस नगर की हूँ मैं
जहाँ न इज्ज़त है न लाज, न हया न शर्म
इज्ज़त्दारों के बीच रहती हूँ हर दिन
फ़िर मेरी इज्ज़त किस तरह हुई कम?
शराफ़त का नक़ाब ओढ चले आते हैं
अय्याशियों में भुलाने अपने ग़म
यूं तो इज्ज़त उनकी भी नहीं रहती
बेवजह समझते हैं ख़ुद को अकलमंद
हालातों से मजबूर तो मैं ही हूँ
पैसों के ढेर तले उनको क्या हैं सितम?

Friday, 13 July 2012

वक़्त


सुबह सुबह उठ कमरे से सूरज की पहली किरणों में,
कभी हम भी जगा करते थेममता भरी माँ की गोद में.
फिर बिस्तर पे लेटके उसे गुस्सा दिलाके खुश हो जाना,
वोह वक़्त कुछ और थाआज की बात कुछ और है.
रोटी और तरह तरह की सब्जियों से सजी हुई प्लेट में
कभी हम भी खाया करते थेरंग बिरंगी थाली में.
ज़्यादा होने पे खाने को इधर उधर बिखेरके खुश हो जाना,
वोह वक़्त कुछ और थाआज की बात कुछ और है.
सड़कों पे बिछी मखमली कुदरत की चादर में
कभी हम भी खेला करते थेमिट्टी की खुशबू में,
टूटे बांस के डंडों से क्रिकेट खेलके खुश हो जाना,
वोह वक़्त कुछ और थाआज की बात कुछ और है.
हवाओं में फैले बूंदों से भरी बरसातों में
कभी हम भी झूमा करते थेबारिश की लपटों में.
बूंदों को मुँह में ले प्यास बुझाके खुश हो जाना,
वोह वक़्त कुछ और थाआज की बात कुछ और है.
मोमबत्ती के जलने पे आए थोड़े बहुत उजाले में
कभी हम भी पढ़ा करते थेउन कोमल किरणों में.
ऊँगली को उस लौ  के बीचो बीच घुमाके खुश हो जाना,
वोह वक़्त कुछ और थाआज की बात कुछ और है.
परेशान होने पे, लेटकरसर रखके माँ की गोद में
कभी हम भी प्यार पाया करते थे, प्यारी उस जन्नत में.
देर तक वहीँ लेट आराम से सोके खुश हो जाना,
वोह वक़्त कुछ और थाआज की बात कुछ और है.

Wednesday, 30 May 2012

खिलौना


लाल रंग की गाडी थी उसकीचलाता रहा जिसे दिन रात
सुनने की फुर्सत भी  थी उसेमैं बस पुकारती रह गई |

काला चशमा आँखों पर उसकीक्या खूब जच रहा था
देखने की फुर्सत भी  थी उसेमैं बस ताकती रह गई |

चमकती गाडी देख उसकीचलाने का मन किया मेरा भी
देने की फुर्सत भी  थी उसेमैं बस फुसफुसाती रह गई  |

खिलौने पे बैठ एक खिलौना,  कर रहा था शानदार सवारी 
जलती रही मैं क्यूँ उससेसोच मैं बस मुस्कुराती रह गई |



Friday, 18 May 2012

यादें


जान  पहचानख्वाबों में फिर भी आती है
सपने तो बहुत हुए, अब बस दीदार बाकी है

आँखें जो खुलती हैं, वोह ही वोह नज़र आती है 
देखना तो बहुत हुआ, अब बस चाहत बाकी है

इस दिल की हर बात, उसके कानों तक जाती है 
कहना तो बहुत हुआ, अब बस सुनना बाकी है

अपनी इस मोहब्बत को, क्या वोह भी आगे बढाती है?
प्यार तो बहुत हुआ, अब बस अंजाम बाकी है

वापस मुड़े उसके ही कदम, फिर क्या मुझे समझाती है!
इंतज़ार तो बहुत हुआ, अब बस इंतकाम बाकी है

क़त्ल कर उस जान को, खुद से ही अब घिन्न  आती है  
बदला तो बहुत हुआ, अब बस उसकी यादें बाकी है

तेरे नाम


धक-धक करती हुईजुदा हुई वोह मुझसे 
जिंदा रहूंगी मैं भीगर आई वोह तेरे काम 
दिल तो था ही, अब धड़कन भी हो गई तेरे नाम

डरी हुई सहमी सी थी वोहछूकर गुज़र गई जो कबसे 
छोडके मेरा घर आँगनकर गई वोह मुझे बदनाम 
जान तो थी ही, अब सांसें भी हो गई तेरे नाम

मुझ जैसी ही थी वोह, जुदा हो गई जो मुझसे 
देखती रही मैं उसकोपहुँच गई वोह तेरे धाम
मैं तो थी ही, अब रूह भी हो गई तेरे नाम

तुम


आँखें बंद करूँ तो फिर वही नज़र आता है
कोई इंसान हो या हो धुएँ में लिपटे एक ख्याल तुम |

एक मूरत दिखती है दूर खड़ी रहती है जो
कोई हक़ीकत हो या हो मेरे मन का ख्वाब तुम  |

उलझा हुआ खुद में एक साया नज़र आता है
कोई सच्चाई हो या हो मेरी आँखों का सराब तुम |

दिल बार-बार मुझे ला खड़ा करता है यहीं 
सवाल यही करता है कि आख़िर कौन हो तुम  
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