Friday, 13 July 2012

वक़्त


सुबह सुबह उठ कमरे से सूरज की पहली किरणों में,
कभी हम भी जगा करते थेममता भरी माँ की गोद में.
फिर बिस्तर पे लेटके उसे गुस्सा दिलाके खुश हो जाना,
वोह वक़्त कुछ और थाआज की बात कुछ और है.
रोटी और तरह तरह की सब्जियों से सजी हुई प्लेट में
कभी हम भी खाया करते थेरंग बिरंगी थाली में.
ज़्यादा होने पे खाने को इधर उधर बिखेरके खुश हो जाना,
वोह वक़्त कुछ और थाआज की बात कुछ और है.
सड़कों पे बिछी मखमली कुदरत की चादर में
कभी हम भी खेला करते थेमिट्टी की खुशबू में,
टूटे बांस के डंडों से क्रिकेट खेलके खुश हो जाना,
वोह वक़्त कुछ और थाआज की बात कुछ और है.
हवाओं में फैले बूंदों से भरी बरसातों में
कभी हम भी झूमा करते थेबारिश की लपटों में.
बूंदों को मुँह में ले प्यास बुझाके खुश हो जाना,
वोह वक़्त कुछ और थाआज की बात कुछ और है.
मोमबत्ती के जलने पे आए थोड़े बहुत उजाले में
कभी हम भी पढ़ा करते थेउन कोमल किरणों में.
ऊँगली को उस लौ  के बीचो बीच घुमाके खुश हो जाना,
वोह वक़्त कुछ और थाआज की बात कुछ और है.
परेशान होने पे, लेटकरसर रखके माँ की गोद में
कभी हम भी प्यार पाया करते थे, प्यारी उस जन्नत में.
देर तक वहीँ लेट आराम से सोके खुश हो जाना,
वोह वक़्त कुछ और थाआज की बात कुछ और है.

1 comment:

  1. गुज़र गया वो वक्त, जब उनके तलबगार थे हम..
    अब वो खुदा भी बन जाएँ, हम सजदा नहीं करेंगे !!!

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