चाहत की प्यास बुझ न पाई
दुनिया सिमट सी आई है
पीने लगे तो ज़हन में आया
भला पानी ने भी कभी आग बुझाई है!
भला पानी ने भी कभी आग बुझाई है!
रूठे उस दिल को अब
मनाने की ख्वाहिश है
कदम आगे बढाये तो जाना
उसने खुद को ही सज़ा सुनाई है
मनाने की ख्वाहिश है
कदम आगे बढाये तो जाना
उसने खुद को ही सज़ा सुनाई है
संभालने लगे खुद को जब
रुकावटें कईं आ खडी हुई
शराब से नाता जुड़ गया तो सुना
मयखाने में किसी ने आग लगाई है
जल रहा यह दिल है अब
शरीर भी अब ज़िन्दा लाश है
उसकी मौत के ग़म के साथ
आज मेरी मौत की भी सुनवाई है
शरीर भी अब ज़िन्दा लाश है
उसकी मौत के ग़म के साथ
आज मेरी मौत की भी सुनवाई है
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