Friday, 6 April 2012

पश्चाताप


चाहत की प्यास बुझ  पाई 
दुनिया सिमट सी आई है
पीने लगे तो ज़हन में आया 
भला पानी ने भी कभी आग बुझाई है!

रूठे उस दिल को अब 
मनाने की ख्वाहिश है 
कदम आगे बढाये तो जाना 
उसने खुद को ही सज़ा सुनाई है

संभालने लगे खुद को जब 
रुकावटें कईं  खडी हुई 
शराब से नाता जुड़ गया तो सुना 
मयखाने में किसी ने आग लगाई है

जल रहा यह दिल है अब 
शरीर भी अब ज़िन्दा लाश है 
उसकी मौत के ग़म के साथ
आज मेरी मौत की भी सुनवाई है

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