सुबह सुबह उठ कमरे से सूरज की पहली किरणों में,
कभी हम भी जगा करते थे, ममता भरी माँ की गोद में.
फिर बिस्तर पे लेटके उसे गुस्सा दिलाके खुश हो जाना,
वोह वक़्त कुछ और था, आज की बात कुछ और है.
कभी हम भी जगा करते थे, ममता भरी माँ की गोद में.
फिर बिस्तर पे लेटके उसे गुस्सा दिलाके खुश हो जाना,
वोह वक़्त कुछ और था, आज की बात कुछ और है.
रोटी और तरह तरह की सब्जियों से सजी हुई प्लेट में,
कभी हम भी खाया करते थे, रंग बिरंगी थाली में.
ज़्यादा होने पे खाने को इधर उधर बिखेरके खुश हो जाना,
वोह वक़्त कुछ और था, आज की बात कुछ और है.
ज़्यादा होने पे खाने को इधर उधर बिखेरके खुश हो जाना,
वोह वक़्त कुछ और था, आज की बात कुछ और है.
सड़कों पे बिछी मखमली कुदरत की चादर में,
कभी हम भी खेला करते थे, मिट्टी की खुशबू में,
कभी हम भी खेला करते थे, मिट्टी की खुशबू में,
टूटे बांस के डंडों से क्रिकेट खेलके खुश हो जाना,
वोह वक़्त कुछ और था, आज की बात कुछ और है.
वोह वक़्त कुछ और था, आज की बात कुछ और है.
हवाओं में फैले बूंदों से भरी बरसातों में,
कभी हम भी झूमा करते थे, बारिश की लपटों में.
बूंदों को मुँह में ले प्यास बुझाके खुश हो जाना,
वोह वक़्त कुछ और था, आज की बात कुछ और है.
बूंदों को मुँह में ले प्यास बुझाके खुश हो जाना,
वोह वक़्त कुछ और था, आज की बात कुछ और है.
मोमबत्ती के जलने पे आए थोड़े बहुत उजाले में,
कभी हम भी पढ़ा करते थे, उन कोमल किरणों में.
ऊँगली को उस लौ के बीचो बीच घुमाके खुश हो जाना,
वोह वक़्त कुछ और था, आज की बात कुछ और है.
ऊँगली को उस लौ के बीचो बीच घुमाके खुश हो जाना,
वोह वक़्त कुछ और था, आज की बात कुछ और है.
परेशान होने पे, लेटकर, सर रखके माँ की गोद में,
कभी हम भी प्यार पाया करते थे, प्यारी उस जन्नत में.
देर तक वहीँ लेट आराम से सोके खुश हो जाना,
वोह वक़्त कुछ और था, आज की बात कुछ और है.
देर तक वहीँ लेट आराम से सोके खुश हो जाना,
वोह वक़्त कुछ और था, आज की बात कुछ और है.